Monday, October 1, 2012

हाँ हुजूर मै चीख रहा हूँ


हाँ हुजूर मै चीख रहा हूँ हाँ हुजूर मै चिल्लाता हूँ
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूँ
मेरा कोई गीत नहीं है किसी रूपसी के गालों पर
मैंने छंद लिखे हैं केवल नंगे पैरों के छालों पर
मैंने सदा सुनी है सिसकी मौन चांदनी की रातों में
छप्पर को मरते देखा है रिमझिम- रिमझिम बरसातों में
आहों कि अभिव्यक्ति रहा हूँ
कविता में नारे गाता हूँ
मै सच्चे शब्दों का दर्पण
संसद को भी दिखलाता हूँ
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूँ
अवसादों के अभियानों से वातावरण पड़ा है घायल
वे लिखते हैं गजरे, कजरे, शबनम, सरगम, मेंहदी, पायल
वे अभिसार पढ़ाने बैठे हैं पीड़ा के सन्यासी को
मैं कैसे साहित्य समझ लूँ कुछ शब्दों कि अय्याशी को
मै भाषा में बदतमीज हूँ
अलंकार को ठुकराता हूँ
और गीत के व्यकरानो के
आकर्षण से कतराता हूँ
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूँ
दिन ढलते ही जिन्हें लुभाएँ वेशालय औ' मधुशालाएँ
माँ वाणी के अपराधी हैं चाहे महाकवि ही कहलायें
अपराधों की अभिलाषाएं मौन चाँदनी कि मस्ती में
जैसे कोई फूल बेचता हो भूखी-नंगी बस्ती में
मैं शब्दों को बजा-बजा कर
घुंघुरू नहीं बना पता हूँ
मै तो पांचजन्य का गर्जन
जनगण-मन तक पहुँचाता हूँ
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूँ
जिनके गीतों कि जननी है महबूबा कि हँसी- उदासी
उनको रास नहीं आ सकते ऊधमसिंह औ' रानी झाँसी
मुझसे ज्यादा मत खुलवाओ इन सिद्धों के आवरणों को
इससे तो अच्छा है पढ़ लो तुम गिद्धों के आचरणों को
मै अपनी कविता के तन पर
गजरे नहीं सजा पता हूँ
अमर शहीदों कि यादों से
मै कविता को महकता हूँ
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूँ

6 comments:

  1. खाली पेट भी अधिक आवाज़ करता है, ढोल की तरह, लोग बजा भी रहे हैं।

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  2. ji haa hum sabhi samjh sakte hai ki aap kisi rupsi ke galo per nahi apitu nange pairo ke chhalo per kavita likhne per majbur huye hai karan desh ki vartman vastu-sthiti hi kuchh aisi hai...hum aapke hriday ki vedna ko samjh sakte hai,
    jo kah na sake use kah sakte hai,
    desh ye behal hai aur koyle se bura haal hai,
    vadra ki taan pe chhida ransangram hai,
    kaise kahe pawar bhaiya ki humara desh azad hai....???
    her juban pe gali hai,
    desh ka kosh khali hai,
    FDI ke josh me desh ki badhali hai,
    kaise kahe bhaiya ki desh me azadi hai....
    RAVI SHUKLA,NAGPUR

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  3. राष्ट्र कवि आदरणीय पँवार जी को नमन

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  4. Garve hota hai khud ke Bhartiye hone par, jab pata hoon ki abhi True Patriot se Sri Hari Om Panwar ji jaise Instan Bharat me hain.

    Pitr tullya, Aapko saadar Pranama.

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  5. Garve hota hai khud ke Bhartiye hone par, jab pata hoon ki abhi True Patriot se Sri Hari Om Panwar ji jaise Instan Bharat me hain.

    Pitr tullya, Aapko saadar Pranama.

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  6. Garve hota hai khud ke Bhartiye hone par, jab pata hoon ki abhi True Patriot se Sri Hari Om Panwar ji jaise Instan Bharat me hain.

    Pitr tullya, Aapko saadar Pranama.

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